महिलाओं के प्रति हिंसा तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून: विहंगावलोकन

“महिलाओं के प्रति हिंसा के संबंध में किसी कानूनी रूप से किसी विशिष्ट बाध्याकारी व्यवस्था के न होने पर मैं देश की सरकार को कैसे जवाबदेह बना सकता हूं?”- महिलाओं के प्रति हिंसा के संबंधित पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ दूत, राशिदा मंजू, 2012; एवरी वुमन सलाहकार

कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं

1981 में, महिलाओं की असमानता का समाधान करने वाली एक ऐतिहासिक संधि को लागू किया गया। महिलाओं के विरूद्ध समस्त प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन का अभिसमय (सीईजीएडब्ल्यू), महिलाओं के संबंध में पहली मानवाधिकार सबंधित विशिष्ट संधि थी और विशेष रूप से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की समानता का पक्ष समर्थन करने वाला अनिवार्य साधन या उपाय है। तथापि, सीईडीएडब्ल्यू द्वारा हिंसा का समाधान नहीं किया जाता है। वस्तुत:, संधि के पाठ में “हिंसा” शब्द का कोई उल्लेख ही नहीं है।
इस चूक को दूर करने के लिए, 1992 में सीईडीएडब्ल्यू में विशिष्ट रूप से महिलाओं के प्रति हिंसा से संबंधित सामान्य सिफारिश को शामिल किया गया। सामान्य सिफारिश संख्या 19 ऐतिहासिक थी। इसके कारण समस्या को पूर्णरूपेण वैश्विक स्तर पर उठाया गया, जिसमें यह अभिस्वीकार किया गया कि महिलाओं और लड़कियों के प्रति हिंसा व्यवस्थाजन्य और विस्तृत है, यह असमानता का उत्पाद है, तथा घर (पूर्व में, घरेलू हिंसा को निजी विषय माना जाता था), में व्याप्त है। इसी के परिणामस्वरूप महिलाओं के प्रति हिंसा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संघ विशेष दूत के पद का सृजन किया गया, जो कि ऐसा कार्य है जिसे हिंसा को दूर करने के लिए समर्पित किया गया है। लेकिन सामान्य सिफारिशें, आधिकारिक संधि का भाग नहीं हैं, इस प्रकार, जी आर 19, जिसे 2017 में अद्यतन किया गया, एक महत्वपूर्ण नीतिगत साधन है, लेकिन इसमें आवश्यक बाध्यता निहित नहीं है जिसके कारण सरकारों को काम करना पड़ता।

इसी प्रकार, 1995 में महिलाओं से संबंधित चौथे विश्व सम्मेलन में बीजिंग प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन में सरकारों से यह सुनिश्चित करने के लिए विधान को अंगीकार करने, कार्यान्वित करने तथा उसकी समीक्षा का आह्वान किया गया कि महिलाओं के प्रति हिंसा को दूर करने में यह प्रभावी हो सके, लेकिन देशों के लिए इसमें कोई कानूनी बाध्यता को समाहित नहीं किया गया है।

सीमित विस्तार

अनेक मानवाधिकार संधियों द्वारा महिलाओं को विशिष्ट स्थितियों में संरक्षा प्रदान की गई है, लेकिन सामूहिक रूप से, वे इतनी व्यापक नहीं हैं कि सभी स्थितियों में महिलाओं और लड़कियों के प्रति हिंसा के सभी स्वरूपों को उनमें शामिल किया जा सके।

शांति, सुरक्षा तथा महिलाओं से संबंधित सुरक्षा परिषद संकल्प (संख्या 1325, 1820, 1888 तथा 1889) संघर्ष की स्थितियों में महिलाओं के प्रति हिंसा से ही संबंधित हैं।

रोम संविधि- वह संधि जिसके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की स्थापना की गई- में नागरिक जनसंख्या में महिलाओं और लड़कियों के प्रति विस्तृत और व्यवस्थागत हिंसा को मानवता के प्रति अपराध माना गया है, और यदि संघर्ष के दौरान ऐसा होता है, तो इस युद्ध अपराध माना जाता है। इसमें देश को नहीं, बल्कि व्यक्तियों को ही अपराधों के लिए जवाबदेह माना जाता है।

प्रताड़ना तथा अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानकारक व्यवहार या सजा के विरूद्ध सम्मेलन

बाल अधिकारों पर सम्मेलन

समस्त प्रवासी कामगारों तथा उनके परिवार के सदस्यों के अधिकारों के संरक्षण से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

बलपूर्वक विलुप्ति से सभी व्यक्तियों की सुरक्षा से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध के विरूद्ध संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की अनुपूरकता में व्यक्तियों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की मानव तस्करी की रोकथाम, शमन तथा सजा से संबंधित प्रोटोकॉल

 

क्षेत्र द्वारा सीमित

महिलाओं के प्रति हिंसा से संबंधित तीन क्षेत्रीय संधियों में वैश्विक स्तर पर अभाव को दूर करने की कोशिश की गई है:

बेलेम दू पारा सम्मेलन (आधिकारिक रूप से महिलाओं के प्रति हिंसा की रोकथाम, सजा तथा उन्मूलन से संबंधित अंतर-अमरीकी अभिसमय, जिसे 1994 में अंगीकृत किया गया) पहली ऐसी क्षेत्रीय संधि थी जो महिलाओं के प्रति हिंसा से विशिष्ट रूप से जुड़ी थी तथा इसके परिणामस्वरूप घरेलू विधान तता सार्वजनिक नीति सुधारों को लागू किया गया जिनमें कुछ लैटिन तथा कैरिबियन देशों में महिलाओं को और अधिक संरक्षा का उपबन्ध किया गया है।

अफ्रीका का मैपूटो प्रोटोकॉल (अफ्रीका में महिला अधिकारों से संबंधित मानव तथा लोगों के अधिकारों से संबंधित अफ्रीकी चार्टर का प्रोटोकॉल जिसे जुलाई 2003 में अंगीकृत किया गया था), एक महिला अधिकार संधि है जिसमें महिलाओं के प्रति हिंसा की सशक्त और मजबूत परिभाषा को शामिल किया गया है और स्पष्ट रूप से इसमें “ वास्तविक हिंसा तथा ऐसे कार्यों जिनका परिणाम हिंसा में होता है” दोनों को शामिल किया गया है। अफ्रीकी महिला अधिकार एनजीओ द्वारा उत्प्रेरित, इसका सृजन अफ्रीकी चार्टर के कार्यान्वयन की कमी को दूर करने के लिए किया गया था, जिसमें महिला अधिकारों और सुरक्षा की गारंटी दी गई है।

यूरोप का इस्तांबुल सम्मेलन (महिलाओं के प्रति हिंसा की रोकथाम तथा सामना करने से संबंधित सम्मेलन, मार्च 2016 में अंगीकृत) को विस्तार के संदर्भ मे सर्वाधिक व्यापक माना जाता है।

भौगोलिक रूप से सीमित होने के साथ-साथ, संधियों की भिन्न भिन्न आवश्यकताओं के कारण, विभिन्न देशों में विस्तृत कानूनी अंतर रह गए हैं (अंतरवैयक्तिक हिंसा से संबंधित कानून पति/पत्नी पर लागू हो सकता है, उदाहरण के लिए पुरूष मित्र पर नहीं), जिसका अर्थ है कि महिलाओं के प्रति हिंसा बहुत व्यापक, व्यवस्थाजन्य मानवाधिकार हिंसा है, जिसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम संरक्षा भी उपलब्ध नहीं है।